आज देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है आरएसएस और इससे जुड़े संगठनों द्वारा भारत के सामाजिक-संवैधानिक व्यवस्था को बदल कर एक कथित हिंदू राष्ट्र बनाने की कार्रवाई के असली मकसद का भंडाफोड़ करने का। अगर हम सब बराबरी, बंधुत्व, न्याय और शांति वाला लोकतंत्र चाहते हैं, तो हम सबको इस सोच और ऐसे संगठनों का पूर्ण बहिष्कार करना होगा।
इस बाबत झारखंड के विभिन्न सामाजिक संगठनों का मंच झारखंड जनाधिकार महासभा ने दो पन्ने का एक पर्चा प्रकाशित उसे लोगों के बीच वितरित करके जागरूकता अभियान चलाया है।
महासभा ने बताया है कि 27 सितम्बर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के गठन का 100 वां साल पूरा हो रहा है। आरएसएस व उसके द्वारा स्थापित दर्जनों सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठन हिंदुत्व की राजनीति करते हैं और भारत को एक कथित हिंदू राष्ट्र बनाने के उद्देश्य से काम करते हैं। पिछले 100 सालों में इनकी विभाजनकारी और संविधान विरोधी सोच समाज और देश को हज़ारों साल पीछे ले गए हैं।
अतः आरएसएस के संकीर्ण विभाजनकारी राष्ट्रवाद और हिन्दू राष्ट्र की अवधारणाओं के विरुद्ध महासभा अभियान चलाकर आरएसएस के 100 वर्ष की पोल खोलने हेतु संलग्न 2 पृष्ठीय पर्चा तैयार किया है जिसको लेकर महासभा के सदस्य संगठन अपने-अपने क्षेत्रों में मोहल्ला/ग्राम सभा में जन चर्चा करेंगे।
उल्लेखनीय है कि संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर ने 1940 में कहा था- “अगर हिंदू राष्ट्र बन जाता है तो बेशक इस देश के लिए एक भारी खतरा उत्पन्न हो जाएगा। यह स्वतंत्रता, बराबरी और बंधुत्व के लिए एक ख़तरा है। इस आधार पर यह लोकतंत्र के अनुपयुक्त है। हिंदू राष्ट्र को हर क़ीमत पर रोका जाना चाहिए।”
बाबा साहब के इसी सोच के साथ संविधान में तो देश को आज़ादी, बराबरी, न्याय और बंधुत्व के मूल्यों पर आधारित धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बनाया गया। एक ऐसा देश जहां सरकारों का कोई धार्मिक रंग नहीं होगा एवं विभिन्न धर्मों व समुदायों के लोग समान अधिकार के नागरिक होंगे। मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा ने भी लोकतांत्रिक देश के लिए यही परिकल्पना की थी। जब उन्होंने संविधान सभा में कहा था कि “आदिवासी दुनिया के सबसे लोकतांत्रिक लोग हैं।”
लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पिछले 100 सालों से इसे ख़त्म करने पर लगा है। आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 2025 में कहा कि “भारत को सच्ची आजादी राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा के दिन मिली थी।”
इस वर्ष (2025) आरएसएस को शुरू हुए 100 साल पूरे हो गए हैं। RSS व उसके द्वारा स्थापित दर्जनों सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठन (जिन्हें मिलाकर “संघ परिवार” कहा जाता है) हिंदुत्व की राजनीति करते हैं और भारत को एक हिंदू राष्ट्र बनाने के उद्देश्य से काम करते हैं। विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्, जनजाति सुरक्षा मंच और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) संघ परिवार के चंद उदाहरण संगठन हैं।
■ 100 सालों में समाज में बस ज़हर फैलाया। इनके खेल को समझें।
आरएसएस की परिकल्पना में हिन्दू राष्ट्र एक ऐसा देश है जहाँ हिन्दू प्रथम दर्जे के नागरिक होंगे और मुसलमान समेत अन्य अल्पसंख्यक धर्म व समुदायों के लोग दूसरे दर्जे के। आरएसएस के पूर्व शीर्ष नेता एम. एस. गोलवलकर ने 1939 में अपनी किताब, ‘हम या हमारी राष्ट्रीयता की परिभाषा, में साफ़ लिखा था “गैर-हिंदू लोगों को या तो हिंदू संस्कृति और भाषा को अपनाना होगा, हिंदू समुदाय और संस्कृति के महिमामंडन के अलावा किसी अन्य विचार को मन में नहीं लाना होगा, या फिर पूरी तरह से हिंदू राष्ट्र के अधीन रहना होगा, कुछ भी दावा नहीं करना होगा, कोई विशेषाधिकार नहीं पाने होंगे, विशेष व्यवहार तो दूर की बात है – यहां तक कि नागरिक अधिकार भी नहीं।”
हिन्दू राष्ट्र जाति व्यवस्था पर आधारित होगा। यह राष्ट्र कुछ संपन्न सवर्ण पुरुषों की आकांक्षाओं के अनुसार चलेगा, जिसमें अन्य जातियों, धर्मों, लिंगों, वर्गों व सोच के लोगों के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक अधिकार बहुत सीमित होंगे। ऐसा राष्ट्र जहां किसानों, मज़दूरों, आदिवासियों, दलितों और महिलाओं के मौलिक अधिकारों की बात नहीं होगी। उल्टा, उन्हें धर्म और जाति व्यवस्था के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा।
आरएसएस के नेताओं की मांग रही है कि देश में बाबासाहेब अंबेडकर के संविधान की बजाए हिंदू धर्म की मनुस्मृति लागू हो, जिसमें महिलाओं व शूद्रों के लिए अमानवीय व्यवहार निर्धारित है। यह महज़ संयोग नहीं है कि आरएसएस में महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं है। कई मायनों में भारत एक हिंदू राष्ट्र बन ही गया है, जिसमें आए दिन मुसलमानों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, प्रगतिशील लोगों आदि पर कई प्रकार के हमले होते रहते हैं। आरएसएस का उद्देश्य भारत के धार्मिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक विविधता को ख़त्म कर एक राष्ट्र, एक संस्कृति और एक भाषा थोपना है। आरएसएस भारत के मुसलमानों और ईसाइयों को विदेशी मानता है और इस फर्जी सोच को फैलाने के लिए “घुसपैठिये” का मिथक फैलाता है।
आरएसएस का 100 वर्षों का इतिहास नफ़रत और हिंसा से भरा हुआ है। यह संगठन राष्ट्रवाद की बात तो बहुत करता है, पर इसकी भारत की आज़ादी की लड़ाई में कोई भूमिका नहीं रही है। उल्टा, आरएसएस ने तो अंग्रेज़ों का साथ दिया था। विनायक सावरकर, जिसे आरएसएस अपना वैचारिक गुरु मानता है, ने तो अंग्रेजों से कई बार माफ़ी भी मांगी थी। और तो और, आरएसएस के कुछ सदस्यों ने मिलकर इस लड़ाई का नेतृत्व कर रहे महात्मा गांधी की हत्या की।
पिछले 100 सालों में संघ परिवार ने देश में मुसलमानों और ईसाई आदिवासियों के विरुद्ध कई सांप्रदायिक हिंसाएं व दंगे फैलाए हैं। इसका सबसे शर्मनाक उदाहरण है 1992 में बाबरी मस्जिद का ध्वंस। अब तो आरएसएस के नेता हर मस्जिद के नीचे मंदिर खोजने में और धार्मिक उन्माद फैलाने में लगे हैं।
■ आरएसएस समस्त हिंदुओं को एक बराबर बोलता है, पर वास्तव में मनुवादी जाति व्यवस्था को बरकरार रखना चाहता है।
आरएसएस के पहले सरसंघचालक के. बी. हेडगेवार छुआछूत करते थे। गोलवलकर ऋग्वेद में दी गई व्यवस्था को “एक जीवित भगवान” बोलते हैं, जिसके अनुसार ब्रह्मांडीय प्राणी “पुरुष” के सर से निकले हैं ब्राह्मण, भुजाओं से निकले हैं क्षत्रिय, जांघों से निकले हैं वैश्य और पैरों से निकले हैं शूद्र। आरएसएस ने आज तक कभी भी जाति विनाश की बात नहीं की है। यह महज़ संयोग नहीं है कि आरएसएस को बनाने वाले और आजतक उसका नेतृत्व करने वाले अधिकांश ब्राह्मण ही रहे हैं। आरएसएस मूलतः दलितों, आदिवासियों व अन्य पिछड़े वर्गों को मिलने वाले आरक्षण का विरोध करता है।
संघ परिवार के लाखों कार्यकर्ता जातिगत शोषण पर चुप्पी साधते हैं, क्योंकि हिंसा करने वाले अधिकांश सवर्ण होते हैं। आरएसएस के दैनिक आचरण में ब्राह्मणवाद भरा हुआ है। मीट-मछली न खाना, महिलाओं को घरेलू कामों में सीमित रखना, जन्म आधारित रोज़गार व्यवस्था को बचाकर रखना (जैसे, जूता बनाने वाले की संतान भी यही काम करती रहें) आदि। आरएसएस अपनी शाखाओं और संगठनों के माध्यम से लोगों को यही सब सिखाता है।
आरएसएस देश में हिंदुत्व को फैलाने के लिए आदिवासियों के स्वतंत्र अस्तित्व और सामुदायिकता को ख़त्म कर रहा है। संघ परिवार लगातार आदिवासियों की स्वतंत्र सांस्कृतिक पहचान और धर्म का विरोध करता रहा है। वह सरना धर्म को अलग नहीं मानता, बल्कि आदिवासियों को हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था में आखरी पायदान पर खड़े वनवासी मानता है। आजकल तो वे लोग “सरना-सनातन एक” का नारा देकर आदिवासियों के पहचान को ख़त्म करने पर तुले हैं।
सरना स्थल और मड़ई को मंदिर बनाने में लगे हैं। घर वापसी के नाम पर आदिवासियों का जबरन धर्म परिवर्तन किया जा रहा है। भाजपा ने आदिवासियों के अलग धर्म “सरना” को क़ानूनी मान्यता देने के लिए कोई पहल नहीं की है। संघ से जुड़े संगठन धर्म के आधार पर आदिवासियों को बांट कर उनकी सामूहिकता को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। ये संगठन सरना आदिवासियों को हिंदू घोषित करके, उन्हें ईसाई धर्म मानने वाले आदिवासियों के विरुद्ध खड़ा कर रहे हैं। आरएसएस तो ईसाई आदिवासियों से आरक्षण का अधिकार भी छीनना चाहता है, जिससे सभी आदिवासी अपने को हिंदू घोषित करने में मजबूर हो।
2014 में जब से आरएसएस द्वारा गठित भाजपा सत्ता में आई है, तब से देश में लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता व बंधुत्व पर व्यापक हमले हुए हैं।
2014 के बाद से मोदी सरकार हिंदुस्तान से लोकतंत्र को ख़तम कर RSS के हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना को स्थापित करने में लगी हुई है। गौ रक्षा के नाम पर हिंदुत्ववादी सोच रखने वाले कई समूहों ने दर्जनों लोगों की हत्या की है, पर सरकार ने हिंसा करने वालों के विरुद्ध कोई कड़ी कार्यवाही नहीं की है।
त्योहारों और पर्वों में मुसलमानों के विरुद्ध गाने, नारे और हिंसा आम बात हो गई है। लव जिहाद और जबरन धर्म परिवर्तन जैसे फ़र्ज़ी आरोपों पर मुसलमानों और ईसाईयों के विरुद्ध कानूनी मामले दर्ज किए जा रहे हैं। सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों के ही मकानों पर बुलडोज़र चलाए जा रहे हैं।
अब तो अल्पसंख्यकों का सामाजिक बहिष्कार के साथ आर्थिक बहिष्कार किया जा रहा है। देश का वर्तमान ही नहीं बल्कि भविष्य को भी बांटने की पूरी तैयारी चल रही है। कहीं हिन्दू धार्मिक ग्रंथों को सरकारी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा रहा है तो कहीं ऐतिहासिक सच्चाई में फेरबदल कर हिंदू नेताओं को प्रमुखता दी जा रही है। संवैधानिक मूल्यों के विपरीत कानून बनाए जा रहे हैं। यह महज़ संयोग नहीं है कि भाजपा मुसलमानों को चुनाव में न के बराबर टिकट देती है और संसद में लगातार मुसलमान सांसदों की संख्या कम हो रही है। 2019 में भाजपा ने तानाशाही तरीके से जम्मू और कश्मीर से धारा 370 हटाई और इस कदम का विरोध रोकने के लिए वहाँ के निवासियों के अनेकों अधिकार व स्वतंत्रताएं छीन ली।
जब सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या में हिंदुत्ववादियों द्वारा ध्वस्त की गई बाबरी मस्जिद के स्थान पर राम मंदिर बनाने की अनुमति दी, तो भाजपा व आरएसएस के शीर्ष नेताओं ने मंदिर के भूमि पूजन और उद्घाटन में अहम भूमिका निभाई। अब तो भाजपा मतदान के संवैधानिक अधिकार का भी हनन करने लगी है, जिसका सीधा निशाना मुसलमान व मेहनतकश वर्ग के वोटर है। केवल सरकारों में नहीं, बल्कि आरएसएस ने अपने कार्यकर्ता व अन्य समर्थक देश के हर महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थान में बिठा दिए है, जिसके गहरे दुष्प्रभाव हो रहे हैं। चुनाव आयोग व अन्य आयोग भी इनके दिशा-निर्देश पर चल रहे हैं। अब अधिकांश समय न्यायालयों में फैसले, स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा व शोध, पुस्तकालयों में किताबें, मीडिया चैनलों पर खबरें आदि हिंदुत्ववादी सोच और लक्ष्यों के अनुरूप ही होती है।
(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)